साल 2025 भारत के लिए कई उम्मीदों और चुनौतियों से भरा रहा है। सरकार ने चुनावी घोषणाओं में कहा था — “हर हाथ को काम और हर थाली में भोजन”। लेकिन आज जब हम आधे दशक की दहलीज़ पर हैं, तो सवाल उठता है — 👉 क्या सच में महंगाई काबू में आई है? क्या नौकरियाँ बढ़ी हैं या घट गई हैं?
🔹 1. महंगाई का बोझ: जनता की जेब पर सीधा असर
रसोई गैस से लेकर सब्ज़ी, दूध और किराया तक — सब कुछ पहले से महंगा हो गया है। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि रिटेल महंगाई दर (CPI) अब भी 6% से ऊपर बनी हुई है, जबकि ग्रामीण इलाकों में खाद्य महंगाई 8% तक पहुँच चुकी है।
🧾 भारत के आम नागरिक के लिए, यह सिर्फ आँकड़े नहीं बल्कि हर रोज़ का संघर्ष है।
LPG Cylinder: ₹900+
दालें: ₹120 प्रति किलो तक
सब्ज़ियाँ: मौसम के हिसाब से 30–40% बढ़ोतरी
🔹 2. बेरोजगारी: नौकरियाँ कहाँ गईं?
सरकार ने 2020–2025 के बीच 5 करोड़ रोजगार देने का वादा किया था। लेकिन CMIE (Centre for Monitoring Indian Economy) के अनुसार — भारत की बेरोजगारी दर अगस्त 2025 में 7.8% रही, जो पिछले पाँच सालों में सबसे अधिक स्तरों में से एक है।
💬 युवाओं का कहना है — “Skill तो है, पर अवसर नहीं।”
🔹 3. सरकारी योजनाएँ: क्या हुआ उन वादों का?
2020 में शुरू हुई कई योजनाएँ जैसे — प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना (PMRPY) आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना डिजिटल स्किल इंडिया मिशन
👉 अब या तो धीमी पड़ चुकी हैं या paper-work में अटकी हैं। ग्राउंड लेवल पर कई राज्यों में इसका असर न के बराबर है।
🔹 4. Private Sector भी संघर्ष में
IT, Manufacturing, और Textile जैसे क्षेत्रों में छँटनी (Layoffs) अब सामान्य हो गई है। 2025 में ही 3 लाख से ज़्यादा कर्मचारियों ने नौकरी खोई है, जबकि नए भर्तियों की दर 15% तक गिर गई है।
🔹 5. सरकार की दलील क्या है?
सरकार का कहना है कि — “भारत की अर्थव्यवस्था अब भी 6.5% की दर से बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बावजूद रोजगार अवसर बढ़ रहे हैं।”
लेकिन ground reality कुछ और कहती है। GDP बढ़ रहा है, पर income और रोज़गार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ रहे।
🔹 आम जनता का सवाल — “वादे पूरे कब होंगे?”
2024 के चुनावों में जो वादे किए गए थे — महंगाई घटेगी, रोजगार बढ़ेगा, युवाओं को अवसर मिलेगा — वो अब 2025 में जनता के गुस्से का कारण बन रहे हैं।
👥 लोगों की राय:
“सिर्फ भाषण और घोषणाएँ नहीं, ज़मीन पर बदलाव चाहिए।”
महंगाई और बेरोजगारी आज सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक चुनौती बन चुकी है। 2025 में भारत के युवा सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि न्याय माँग रहे हैं। अब देखना यह है कि आने वाले महीनों में सरकार क्या ठोस कदम उठाती है या फिर ये मुद्दे फिर से वादों तक सीमित रहेंगे।